
रायगढ़.तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश,डिजिटल युग के बढ़ते प्रभाव और पुलिस व्यवस्था पर बढ़ते दबाव के बीच खाकी की छवि और संवेदनशीलता पर सवाल उठने लगे हैं। ऐसे दौर में जब कानून व्यवस्था के साथ-साथ मानवीय मूल्यों की भी परीक्षा हो रही है,तब एक अनुभवी पुलिस अधिकारी की दृष्टि बेहद मायने रखती है।लंबे प्रशासनिक अनुभव के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय रहे रिटायर्ड आईजी और साहित्यकार जयंत थोरात ने ‘छत्तीसगढ़ क्रानिकल’ से विशेष बातचीत में पुलिसिंग के बदलते स्वरूप,सोशल मीडिया से उपजे अपराध,संवेदनशीलता में कमी, कस्टोडियल हिंसा और साहित्य की भूमिका जैसे अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने पूर्व डीजीपी विश्वरंजन को उचित सम्मान न मिलने पर भी गहरी पीड़ा व्यक्त की।बीते शनिवार को एक निजी कार्यक्रम मे पधारे रायगढ़ के पूर्व एसएसपी एवं सेवानिवृत्त आईजी जयंत थोरात जी से लंबे समय बाद साक्षात्कार का अवसर प्राप्त हुआप्रश्न 1:पुलिस सेवा से अवकाश के बाद आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं? साहित्य सृजन को कितना समय दे पा रहे हैं?जवाब:अब परिवार ही मेरी प्राथमिकता है।सेवा के दौरान घर-परिवार को पर्याप्त समय नहीं दे पाया,जिससे कुछ नाराजगी भी रही। अब साहित्य सृजन के लिए भरपूर समय मिल रहा है और उसी में मन लगता है।प्रश्न 2:सोशल मीडिया के इस दौर का समाज और अपराध पर कितना असर देखते हैं?जवाब: सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत गहरा है।इसके कारण नशा, ठगी और विभिन्न प्रकार के अपराध तेजी से बढ़े हैं।लोग नकारात्मक और भ्रामक चीजों पर ज्यादा प्रतिक्रिया देते हैं,जो समाज के लिए चिंताजनक है।प्रश्न 3:आपके समय की पुलिसिंग और आज की पुलिसिंग में क्या अंतर दिखता है?जवाब: बहुत बड़ा फर्क नजर आता है।पहले पुलिसिंग के मूलभूत सिद्धांत मजबूत थे,अब उनमें कमी दिखती है।जहां तक चारित्रिक दोष की बात है,वह व्यक्ति की परवरिश और व्यक्तिगत मूल्यों पर निर्भर करता है।प्रश्न 4:आपकी रचनाओं में प्रशासनिक अनुभव कम क्यों दिखता है?जवाब:मैं प्रकृति,रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं पर लिखना पसंद करता हूं। सामाजिक दूरियों और कमियों को शब्द देता हूं। प्रशासनिक जीवन इतना लंबा रहा कि अब उससे अलग होकर कुछ अलग लिखने का मन करता है।
प्रश्न 5:क्या आज की पुलिस आम आदमी के लिए उतनी संवेदनशील है जितनी होनी चाहिए?*जवाब: मेरे अनुभव में पुलिस की संवेदनशीलता में कमी आई है। इसके पीछे कई तरह के दबाव और बल की कमी जैसे कारण हैं,जो पुलिस के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।प्रश्न 6: *कस्टोडियल हिंसा के आरोपों पर आपकी क्या राय है?जवाब:पुलिस प्रशिक्षण में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता कि अत्यधिक बल प्रयोग से किसी की मौत हो जाए। ऐसी घटनाएं विभाग की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं।इस तरह की मानसिकता का समर्थन बिल्कुल भी उचित नहीं है। प्रश्न 7:बतौर साहित्यकार,क्या छत्तीसगढ़ सरकार साहित्य को लेकर गंभीर है?जवाब:सरकार साहित्य के प्रति संवेदनशील है और समय-समय पर सम्मान व प्रोत्साहन भी देती है। हालांकि अपेक्षाओं के अनुरूप अभी और प्रयास की जरूरत है।
प्रश्न 8:पूर्व डीजीपी विश्वरंजन के निधन को आप कैसे देखते हैं?जवाब: वे एक अनुशासित और कुशल प्रशासक थे। छत्तीसगढ़ पुलिस में उनका योगदान अमूल्य रहा,खासकर बस्तर क्षेत्र में।उनका निधन राज्य के लिए अपूरणीय क्षति है। दुख इस बात का है कि उन्हें मरणोपरांत भी अपेक्षित सम्मान नहीं मिला।प्रश्न 9:युवाओं में पढ़ने की आदत कम हो रही है—आप क्या सलाह देंगे?जवाब: किताबें जीवन की सच्ची मित्र और मार्गदर्शक होती हैं। पढ़ने से विचारों की शक्ति बढ़ती है और वही व्यक्ति के कर्म को दिशा देती है। युवाओं को अच्छी किताबें पढ़ने की आदत जरूर डालनी चाहिए।इस विशेष बातचीत में जयंत थोरात ने साफ शब्दों में बताया कि बदलते दौर में पुलिस व्यवस्था को न सिर्फ तकनीकी रूप से मजबूत करना जरूरी है,बल्कि संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण को भी पुनर्स्थापित करना होगा। वहीं,साहित्य को उन्होंने समाज के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा और मार्गदर्शन का माध्यम बताया।*



