रायगढ़ खरीफ मौसम में धान की अच्छी बढ़वार, उच्च उत्पादन एवं बेहतर गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए समय पर खरपतवार प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण है। धान की फसल में खरपतवार पोषक तत्व, नमी, प्रकाश एवं स्थान के लिए मुख्य फसल से प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे फसल की वृद्धि प्रभावित होती है और उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। इसलिए किसानों को फसल की अवस्था के अनुरूप वैज्ञानिक तरीके से खरपतवार प्रबंधन अपनाना चाहिए।कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, रायगढ़ के अधिष्ठाता डॉ ए.के. सिंह ने बताया कि धान की फसल में बुआई अथवा रोपाई के बाद के प्रारंभिक 20 से 30 दिन खरपतवार नियंत्रण की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इस अवधि में खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण करने से फसल का विकास बेहतर होता है, पोषक तत्वों का समुचित उपयोग होता है तथा अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि रोपा एवं बोता धान में अंकुरण-पूर्व तथा अंकुरण-बाद दोनों अवस्थाओं में अनुशंसित खरपतवारनाशकों का निर्धारित समय एवं मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।
रोपा धान में अंकुरण-पूर्व करें खरपतवार नियंत्रण
डॉ. सिंह ने बताया कि रोपा धान में रोपाई के 0 से 3 दिन के भीतर पेंडीमेथालिन, पाइराजोसल्फ्यूरॉन, प्रेटीलाक्लोर, बेनसल्फ्यूरॉन मिथाइल प्रेटीलाक्लोर, ब्यूटाक्लोर तथा फ्लूसटोसल्फ्यूरॉन जैसे अनुशंसित खरपतवारनाशकों का उपयोग किया जा सकता है। वहीं पिनोक्सूलम ब्यूटाक्लोर का प्रयोग रोपाई के 0 से 7 दिन के भीतर किया जा सकता है। इन खरपतवारनाशकों से संकरी पत्ती, चौड़ी पत्ती तथा मोथा वर्ग के खरपतवारों जैसे सांवा, बटन मोथा, जल मोथा, नागर मोथा, लौंग घास, दुब घास, कोआ केनी, घोड़चब्बा सहित अन्य प्रारंभिक खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण होता है।
बोता धान में भी शुरुआती नियंत्रण आवश्यक
डॉ. सिंह ने बताया कि बोता धान में भी बुआई के 0 से 3 दिन के भीतर पेंडीमेथालिन एवं पाइराजोसल्फ्यूरॉन जैसे अंकुरण-पूर्व खरपतवारनाशकों का उपयोग करने से प्रारंभिक अवस्था में खरपतवारों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। इससे फसल को शुरुआती प्रतिस्पर्धा से बचाकर पौधों की समान एवं स्वस्थ बढ़वार सुनिश्चित होती है।
अंकुरण-बाद खरपतवार नियंत्रण से मिलेगा बेहतर परिणाम
डॉ. सिंह ने बताया कि रोपा एवं बोता धान में खरपतवार की स्थिति के अनुसार 15 से 25 दिन के बीच अंकुरण-बाद खरपतवारनाशकों का उपयोग करना चाहिए। इसके लिए बिसपाइरीबैक सोडियम, पिनोक्सूलम, क्लोरीम्यूरॉन इथाइल ़ मेट्सल्फ्यूरॉन मेथाइल, 2,4-डी एमाइन साल्ट, इथॉक्सीसल्फ्यूरॉन, फेनोक्साप्रॉप इथाइल, पिनोक्सूलम ़ सायलोफॉप-ब्यूटाइल, बिसपाइरीबैक सोडियम ़ पिनोक्सूलम, फ्लोरपायराक्सीफेन आधारित मिश्रण तथा ट्राइफामोऩ इथॉक्सीसल्फ्यूरॉन जैसे अनुशंसित खरपतवारनाशकों का उपयोग किया जा सकता है। इनसे संकरी पत्ती, चौड़ी पत्ती एवं मोथा वर्ग के अधिकांश खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण संभव है, जिससे फसल की बढ़वार प्रभावित नहीं होती और उत्पादन में वृद्धि होती है।
छिड़काव के समय रखें इन बातों का विशेष ध्यान
डॉ. सिंह ने बताया कि सभी खरपतवारनाशकों का उपयोग अनुशंसित मात्रा को लगभग 150 लीटर पानी प्रति एकड़ में घोलकर समान रूप से छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव के समय खेत में पर्याप्त नमी बनी रहनी चाहिए तथा तेज हवा या वर्षा की संभावना होने पर दवा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। साथ ही खेत में उपस्थित खरपतवारों की प्रजाति एवं फसल की अवस्था के अनुसार ही उपयुक्त खरपतवारनाशक का चयन करना चाहिए। उन्होंने किसानों से कहा कि खरपतवारनाशकों का प्रयोग कृषि वैज्ञानिकों की अनुशंसा एवं निर्धारित मात्रा के अनुसार करें। वैज्ञानिक पद्धति से समय पर खरपतवार प्रबंधन अपनाने से धान की फसल स्वस्थ एवं सशक्त बनेगी, उत्पादन लागत में कमी आएगी तथा किसानों को अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उपज प्राप्त होगी।


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