
रायगढ़ छत्तीसगढ़ राज्य का बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री ओ. पी. चौधरी ने इसे “थीम संकल्प” का बजट बताया। लगभग ₹1.72 लाख करोड़ के कुल व्यय अनुमान के साथ इसमें लगभग ₹1.45 लाख करोड़ राजस्व व्यय तथा ₹26,500 करोड़ पूंजीगत व्यय के रूप में निर्धारित किए गए हैं। सरकार का दावा है कि बजट समावेशी विकास, अधोसंरचना सुदृढ़ीकरण, निवेश प्रोत्साहन, कौशल विकास, अंत्योदय और आजीविका संवर्धन पर केंद्रित है।बजट की एक प्रमुख विशेषता विभिन्न “मुख्यमंत्री मिशनों” की घोषणा है। इनमें एआई मिशन, पर्यटन विकास मिशन, खेल उत्कृष्टता मिशन, अधोसंरचना मिशन तथा स्टार्टअप एवं निपुण मिशन शामिल हैं। प्रत्येक मिशन के लिए ₹100 करोड़ का प्रावधान किया गया है। नई तकनीक, पर्यटन, खेल और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों पर ध्यान देना सकारात्मक संकेत माना जा सकता है, विशेषकर युवाओं और उभरते उद्यमों के संदर्भ में।हालाँकि, इस बजट पर बहुत आशाएँ थी,सार्वजनिक विमर्श में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठ रहे हैं। बढ़ती महंगाई,बेरोजगारी,भ्रष्टाचार, मुद्रास्फीति और राज्य पर बढ़ते ऋण बोझ जैसे मुद्दों पर ठोस और स्पष्ट रणनीति की अपेक्षा की जा रही थी। विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ,समूहों का मत है कि उद्योग एवं निवेश प्रोत्साहन के साथ-साथ कृषि, लघु उद्योग, असंगठित क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी अधिक ठोस प्रावधानों की आवश्यकता है। सरकार पुनः उद्योगपतियों कॉरपोरेट के सामने घुटने टेकते,पूर्ण समर्पित होते हुए नजर आई। पर्यावरण संरक्षण—विशेषकर जल, जंगल और जमीन—से जुड़े विषयों पर भी स्पष्ट दीर्घकालिक नीति का संकेत अपेक्षित था। छत्तीसगढ़ जैसे वन-संपन्न राज्य में जलस्रोतों के संरक्षण,प्रदूषण नियंत्रण और आदिवासी समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसी प्रकार कला, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में भी अधिक स्पष्ट पहल की आवश्यकता महसूस की गई है।जिसके पूर्ण “संकल्प” का अभाव दिखा।कुल मिलाकर,यह बजट राज्य की विकास दिशा को रेखांकित करता है और कई नए मिशनों के माध्यम से भविष्य उन्मुख दृष्टि की वकालत करता दिखाई तो पड़ता है। लेकिन अब चुनौती इसके प्रभावी क्रियान्वयन और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करने की ठोस रणनीति में निहित है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि घोषित संकल्प धरातल पर किस हद तक साकार हो पाते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के समावेशी विकास की कल्पना मात्र शब्दों के श्रृंगार तक सीमित न रह जाए।।




