रायगढ़ महानदी केवल छत्तीसगढ़ और ओड़िशा के बीच बहने वाली एक नदी नहीं है। वह किसी राज्य की सीमा-रेखा भी नहीं है और न ही केवल जल के बँटवारे का कोई प्रशासनिक प्रश्न। महानदी एक जीवित जीवन दायनी प्राकृतिक जल स्त्रोत है—जिसके साथ खेत खलिहान, जंगल, तालाब, मछलियाँ, पशु-पक्षी, गांव, शहर, आजीविकाएँ, लोक-स्मृतियाँ, संस्कृतियाँ और करोड़ों लोगों का भविष्य जुड़ा हुआ है।
नदियाँ केवल पानी नहीं देतीं; वे सभ्यताओं को जन्म देती हैं। उनके किनारे जीवन बसता है, कृषि विकसित होती है, संस्कृति आकार लेती है और मनुष्य के सामाजिक संबंधों की नई संरचनाएँ बनती हैं। इसलिए महानदी को केवल ‘जल-संसाधन’ मानकर देखने की दृष्टि अधूरी है।
महानदी वास्तव में छत्तीसगढ़ और ओड़िशा के बीच साझी प्राकृतिक विरासत और साझा जीवनधारा है।
केंद्रीय जल आयोग के आकलन के अनुसार महानदी बेसिन लगभग 1.45 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है और इसका लगभग 52.94 प्रतिशत क्षेत्र छत्तीसगढ़ तथा 46.33 प्रतिशत ओड़िशा में है; नदी की कुल लंबाई लगभग 851 किलोमीटर है।
इस भौगोलिक तथ्य का अर्थ ही यही है कि महानदी को दो राज्यों के अलग-अलग हितों के चश्मे से देखने के बजाय पूरे नदी-बेसिन की समग्रता में देखने की आवश्यकता है।
विवाद नदी का नहीं, दृष्टिकोण का है-
महानदी को लेकर छत्तीसगढ़ और ओड़िशा के बीच विवाद नया नहीं है। ओड़िशा ने 2016 में अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम के तहत शिकायत की और केंद्र सरकार ने 2018 में महानदी जल विवाद अधिकरण का गठन किया। मामला अभी भी न्यायिक प्रक्रिया में है।
जुलाई 2026 में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की केंद्रीय जल शक्ति मंत्री की अध्यक्षता में बैठक भी हुई, जिसमें स्थायी समाधान, संवाद और आपसी सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
यह सकारात्मक संकेत है।
लेकिन सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या महानदी का भविष्य केवल इस बात से तय होगा कि किस राज्य को कितना पानी मिलेगा?या फिर हमें यह भी तय करना होगा कि नदी में कितना पानी बचा रहना चाहिए?
कितना पानी पीने के लिए चाहिए?कितना कृषि के लिए?कितना उद्योगों के लिए?कितना भूजल को पुनर्भरण करने के लिए?और कितना नदी के अपने पारिस्थितिक जीवन के लिए?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है तो किसी भी जल-बँटवारे का समझौता अधूरा रहेगा।
क्या दोनों राज्यों की जल नीतियां पर्याप्त हैं ?-
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है।
छत्तीसगढ़ ने 2022 में अपनी State Water Resources Development Policy घोषित की है। इस नीति में पेयजल और कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता देने, जलस्रोतों की स्थिरता, भूजल और सतही जल के समन्वित उपयोग तथा पर्यावरणीय पक्षों को ध्यान में रखने की बात कही गई है।
ओड़िशा में 2007 की राज्य जल नीति लागू है। उसमें पेयजल एवं घरेलू उपयोग को प्रथम, पारिस्थितिकी को द्वितीय, सिंचाई-कृषि को तृतीय और उद्योगों को पांचवें क्रम पर रखा गया है। ओड़िशा सरकार ने हाल के वर्षों में नई जल नीति की आवश्यकता पर भी विचार किया है और 2025 की दृष्टि-दस्तावेजी योजनाओं में नई राज्य जल नीति, जल-बजट तथा क्षेत्रवार आवंटन की रूपरेखा तैयार करने की बात कही गई है।
इसलिए आज का असली सवाल यह है—
क्या दोनों राज्यों की वर्तमान जल नीतियां आज की वास्तविकताओं के लिए पर्याप्त हैं?
क्या उनमें जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, सूखा-बाढ़ के बदलते स्वरूप, भूजल संकट, औद्योगिक जल मांग, शहरीकरण, नदी की पारिस्थितिकी और अंतरराज्यीय नदी-बेसिन प्रबंधन को पर्याप्त महत्व दिया गया है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या इन नीतियों का जमीन पर ईमानदारी से पालन हो रहा है?
जल नीति कागज पर नहीं, जमीन पर दिखाई दे-
जल नीति का अर्थ केवल सरकारी दस्तावेज नहीं होना चाहिए। एक प्रभावी जल नीति में राज्य का पूरा Water Budget—जल बजट स्पष्ट होना चाहिए।
कितना पानी उपलब्ध है?कितना वर्षा से आता है?कितना सतही जल है?कितना भूजल है?कितना संग्रहित किया जा सकता है?कितना पानी हर वर्ष कृषि लेती है?कितना पेयजल में जाता है?कितना उद्योगों को दिया जाता है?कितना पानी वापस नदी में आता है और किस गुणवत्ता के साथ?
और नदी में पर्यावरणीय प्रवाह के रूप में न्यूनतम कितना पानी हर मौसम में रहना आवश्यक है?इन प्रश्नों के बिना जल-प्रबंधन वास्तव में अनुमान और दावों का खेल बन जाता है।
उद्योग जरूरी हैं, लेकिन जल और जीवन से बड़े नहीं हो सकते-
विकास के लिए उद्योग आवश्यक हैं। रोजगार, उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों के लिए उद्योग चाहिए। लेकिन उद्योगों का विकास इस मूल सिद्धांत पर नहीं हो सकता कि पहले उद्योग को पानी मिले और फिर समाज अपने हिस्से का पानी खोजे।
ओड़िशा की मौजूदा व्यवस्था में भी उद्योगों के लिए जल आवंटन एक निर्धारित प्राथमिकता-क्रम के बाद किया जाता है और जल संसाधन विभाग इसके लिए जिम्मेदार है।
छत्तीसगढ़ में भी औद्योगिक जल आवंटन के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था और नीति मौजूद है।
इसलिए प्रश्न उद्योग बनाम जनता का नहीं है।
मुख्य प्रश्न है —
क्या औद्योगिक विकास जल की वहन-क्षमता के भीतर हो रहा है?
यदि किसी क्षेत्र में भूजल तेजी से गिर रहा है, स्थानीय तालाब सूख रहे हैं, किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा और उसी क्षेत्र में नए जल-गहन उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं, तो विकास की उस अवधारणा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
औद्योगिक निवेश के लिए एमओयू होना विकास की गारंटी नहीं है।उसी तरह पानी का आवंटन हो जाना पानी की उपलब्धता की गारंटी नहीं है।
मनुष्य और नदी के सह-अस्तित्व की लड़ाई –
हम जल को मनुष्य के उपयोग की वस्तु मानते रहे हैं। लेकिन आधुनिक जल-प्रबंधन की सबसे महत्वपूर्ण समझ यह है कि नदी को पूरी तरह खाली कर देना नदी का प्रबंधन नहीं है।
नदी में भी पर्याप्त प्रवाह चाहिए।मछलियों और जलीय जीवों के लिए पानी चाहिए।नदी के किनारे के जंगलों और आर्द्रभूमियों के लिए पानी चाहिए।
भूजल के पुनर्भरण के लिए पानी चाहिए।डेल्टा और समुद्री पारिस्थितिकी के लिए पानी चाहिए।अर्थात जल का एक हिस्सा स्वयं नदी के जीवन के लिए सुरक्षित रहना चाहिए।
महानदी को बचाने की लड़ाई इसलिए केवल छत्तीसगढ़ बनाम ओड़िशा नहीं हो सकती।यह मनुष्य बनाम नदी भी नहीं होनी चाहिए।यह मनुष्य और नदी के सह-अस्तित्व की लड़ाई है।
दोनों राज्यों को साझा महानदी जल-बजट बनाना चाहिए-
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक विजय की नहीं, बल्कि साझे वैज्ञानिक ज्ञान और पारदर्शिता की है।
छत्तीसगढ़ और ओड़िशा को मिलकर महानदी बेसिन का एक सार्वजनिक, स्वतंत्र और वैज्ञानिक साझा जल-बजट तैयार करना चाहिए।
इसमें वर्षवार और मौसमवार—
वर्षा और जल उपलब्धता,बांधों और जलाशयों की स्थिति,भूजल स्तर,सिंचाई की आवश्यकता,पेयजल की आवश्यकता, औद्योगिक जल उपयोग,जलाशयों में वाष्पीकरण और अन्य हानियां,पर्यावरणीय प्रवाह,बाढ़ एवं सूखे की स्थिति,तथा भविष्य की जल मांग का पारदर्शी आंकड़ा सार्वजनिक होना चाहिए।
जब आंकड़े दोनों राज्यों के सामने एक ही होंगे, तब विवाद के राजनीतिक तापमान को कम करके वैज्ञानिक संवाद को आगे बढ़ाना संभव होगा।
प्राथमिकताएं स्पष्ट होनी चाहिए-
दोनों राज्यों की जल नीतियों में प्राथमिकताओं का उल्लेख पहले से है। अब आवश्यकता उन्हें और अधिक स्पष्ट, बाध्यकारी तथा समयानुकूल बनाने की है।
पहली प्राथमिकता—पीने और घरेलू उपयोग के लिए सुरक्षित पानी।दूसरी—कृषि, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका।तीसरी—नदी की पारिस्थितिकी और न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह।चौथी—लघु, कुटीर और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े जल उपयोग।और उसके बाद—बड़े जल-गहन उद्योगों सहित अन्य वाणिज्यिक उपयोग।
इस क्रम में एक महत्वपूर्ण बात और जुड़नी चाहिए—जल की उपलब्धता के अनुसार उद्योग का आकार और स्वरूप निर्धारित हो, उद्योग की मांग के अनुसार नदी की सीमा न बदली जाए।
बारिश का पानी नदी तक पहुंचने से पहले क्यो खो जाए?-
महानदी को बचाने का अर्थ केवल बांधों और बड़े जलाशयों पर चर्चा करना नहीं है।
छोटे तालाबों का पुनर्जीवन, पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण, जलग्रहण क्षेत्र का उपचार, जंगलों का संरक्षण, खेत-तालाब, चेकडैम, भूजल पुनर्भरण, वर्षाजल संचयन और शहरों में अनिवार्य rainwater harvesting—ये सभी महानदी की दीर्घकालीन सुरक्षा से जुड़े विषय हैं।
बाढ़ के समय पानी को संकट और गर्मी में पानी की कमी को नियति मान लेना जल-प्रबंधन नहीं है।
बरसात का अतिरिक्त पानी संग्रहित करना और उसे धीरे-धीरे भूजल तथा नदी-तंत्र में लौटाना ही भविष्य का विवेकपूर्ण जल-प्रबंधन है।
महानदी को राजनीतिक नारा नहीं, सामाजिक संकल्प बनाइए-
महानदी को बचाने के लिए न तो भावनात्मक भाषणों की जरूरत है और न किसी राज्य के विरुद्ध जनभावना भड़काने की।जरूरत है—तथ्य, पारदर्शिता, वैज्ञानिक अध्ययन, जनभागीदारी और राजनीतिक ईमानदारी की।
दोनों राज्यों के किसान महानदी से जुड़े हैं।दोनों राज्यों के गांव महानदी से जुड़े हैं।दोनों राज्यों की संस्कृति में नदी का स्थान है।दोनों राज्यों का भविष्य जल-सुरक्षा से जुड़ा है।फिर नदी को विवाद की दीवार क्यों बनाया जाए?
क्यों न इसे सहयोग का सेतु बनाया जाए?
कुछ महत्वपूर्ण जरूरी सवाल –
क्या दोनों राज्य सार्वजनिक रूप से बताएंगे कि उनके पास वास्तविक रूप से उपयोग योग्य पानी कितना है?
क्या हर बड़े उद्योग को दिए गए जल आवंटन और उसके वास्तविक जल उपयोग का विवरण सार्वजनिक होगा?
क्या यह सुनिश्चित होगा कि किसी उद्योग को पानी देने से पहले स्थानीय पेयजल और कृषि की आवश्यकता सुरक्षित हो?
क्या प्रत्येक बड़े जल-परियोजना के साथ पर्यावरणीय प्रवाह का वैज्ञानिक निर्धारण होगा?
क्या महानदी बेसिन का साझा जल-बजट जनता के सामने रखा जाएगा?
क्या दोनों राज्य नदी के पानी के साथ-साथ नदी की सेहत का भी संयुक्त आकलन करेंगे?
क्या जलाशयों, नदियों और भूजल के आंकड़े रियल टाइम या नियमित अंतराल पर सार्वजनिक किए जाएंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या महानदी का भविष्य राजनीतिक सीमा से तय होगा या नदी-बेसिन की प्राकृतिक क्षमता से?
इन प्रश्नों से बचकर कोई स्थायी समाधान संभव नहीं है।
महानदी का भविष्य, समझौते से बड़ा प्रश्न है-
महानदी जल विवाद का समाधान केवल इस बात में नहीं है कि छत्तीसगढ़ को कितना पानी मिले और ओड़िशा को कितना।
स्थायी समाधान तब होगा जब दोनों राज्य यह स्वीकार करेंगे कि—महानदी किसी एक राज्य की संपत्ति नहीं, साझा प्राकृतिक धरोहर है।
उसके जल पर मनुष्य का अधिकार है, लेकिन उसके अस्तित्व की जिम्मेदारी भी मनुष्य की ही है।
इसलिए महानदी को बाँटने की राजनीति से आगे बढ़ना होगा।
उसे बचाने की नीति बनानी होगी।उसे प्रदूषण से बचाना होगा।उसके जलग्रहण क्षेत्रों को बचाना होगा।तालाबों और छोटे जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा।भूजल को सुरक्षित करना होगा।औद्योगिक जल उपयोग को नियंत्रित और पारदर्शी बनाना होगा।
और सबसे बढ़कर—नदी के प्रवाह को जीवित रखना होगा।क्योंकि नदी सूखती है तो केवल पानी नहीं सूखता।उसके साथ खेत सूखते हैं, आजीविकाएं सूखती हैं, लोक-स्मृतियां सूखती हैं, संस्कृति कमजोर होती है और अंततः मनुष्य का भविष्य भी संकट में पड़ता है।
महानदी को इसलिए केवल जल-विवाद के रूप में मत देखिए।यह आने वाली पीढ़ियों के जीवन का प्रश्न है।
छत्तीसगढ़ और ओड़िशा यदि सचमुच अपने लोगों के हित में आगे बढ़ना चाहते हैं तो उन्हें महानदी को लेकर एक नया अध्याय लिखना होगा—
विवाद से सहयोग का, बंटवारे से संरक्षण का और राजनीति से ऊपर उठकर जीवन का।
महानदी बहे—निर्बाध, निर्मल और जीवंत।
यही दोनों राज्यों के लोगों की साझी समृद्धि और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।
गणेश कछवाहा
रायगढ़, छत्तीसगढ़।
gp.kachhwaha@gmail.com


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