समय-समय पर भारत माता की गोद में अनेक महान विभूतियों ने आकर अपने अद्भुत प्रभाव से संपूर्ण विश्व को आलोकित किया है।नानक,कबीर, महावीर, दयानंद, विवेकानंद आदि ऐसे ही महान विभूतियां हैं, जिनमें से महात्मा गांधी का नाम सर्वोपरि आता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भारत के एक महान राजनेता,विचारक, समाज सुधारक एवं शिक्षाविद् थे।उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बच्चे के शरीर, मस्तिष्क एवं आत्मा का उत्तम रूप से सर्वांगीण विकास करना है। गांधी जी साक्षरता को शिक्षा नहीं मानते थे। उनके अनुसार साक्षरता केवल एक साधन है, जिसके द्वारा पुरूष एवं स्त्रियों को शिक्षित किया जा सकता है।
गांधी जी का मानना था कि शिक्षा ऐसी हो,जो छात्रों को शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बना सके, उनमें सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास कर सके, अनुशासित स्वतंत्रता की भावना विकसित हो तथा नैतिक-अनैतिक, अच्छे-बुरे आदि की भावना भी विकसित कर सके।तभी किसी ने कहा है कि
सदियों का पुण्य कमाकर जब महामानव धरती पर आते हैं, दिशा भ्रमित समाज को तब,नई दिशा दे जाते हैं।
” एक अद्भुत क्रांति मचाई थी , विचारों की उस आंधी ने”।
दुनिया को युग दर्शन दिया, हमारे प्यारे बापू गांधी ने”।
महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा के पुजारी थे,जो उनके जीवन दर्शन में समाहित है। बचपन से ही गांधी जी ने स्वयं में सत्यवादी हरिश्चंद्र का व्यक्तित्व विकसित करने का प्रयास किया।वे आजीवन उन मूल्यों का अनुसरण करते रहते थे। महात्मा गांधी वह पावन नाम जो पूरे विश्व में भारतीयता की एक अद्भुत छाप छोड़ गये। जिन्हें सुनने, समझने के लिए अथक प्रयास की जरूरत आज की पीढ़ी को है। शैक्षिक दर्शन में गांधी जी की वर्धा योजना की बातें सामने लायें तो सन् १९३७ में वर्धा के राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन में गांधी जी ने अपनी शिक्षा योजना को प्रस्तुत किया था,उसकी भूरी- भूरी प्रशंसा विदेशों में बसे शिक्षाविदों, शोधार्थियों ने की थी।
महात्मा गांधी जी के शैक्षिक दर्शन के आधारभूत सिद्धांतों में संपूर्ण देश में ७ से १४ वर्ष के बालकों की शिक्षा नि:शुल्क एवं अनिवार्य होनी चाहिए,शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए, शिक्षा को बालक के शरीर,हृदय, मस्तिष्क और आत्मा का सामंजस्य पूर्ण विकास करना चाहिए था। शिक्षा में स्थानीय उद्योग को आधार बनाया जाये,शिक्षा रोजगार परक हो, पढ़े-लिखे बेरोजगार न हों।
रोजगार के साधन उपलब्ध होने पर बेरोजगारी कम होगी। रोजगार मिलने से मानव आत्मनिर्भर बनेगा। सांस्कृतिक लक्ष्य के अंतर्गत बच्चों की शिक्षा ऐसी हो,जो संस्कृति एवं परंपराओं के मूल्यों पर आधारित हो।
नैतिक एवं चारित्रिक उन्नयन पर बल दिया,वे सत्य और ईश्वर प्राप्ति को शिक्षा के साथ समायोजित करना चाहते थे, जिससे मानव अपने सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके।
गांधीजी का शिक्षा दर्शन आदर्शवाद, प्रयोजन वाद,एवं प्रकृति वाद तीनों से ही प्रभावित हैं। उनके अनुसार शिक्षा में मातृभाषा को महत्व देने का विचार प्रासंगिक है। इससे बच्चों की शिक्षा के प्रति रूचि बढ़ेगी और नामांकन दर में भी वृद्धि होगी। नई शिक्षा नीति में इसे लागू किया गया है। शिक्षा को कौशल तथा हस्तशिल्प से जोड़े जाने से बेरोजगारी तथा गरीबी की समस्या का निदान होगा। पाठ्यक्रम में महात्मा गांधी जी के अनुसार खेलकूद, व्यायाम, सृजनात्मक विकास पर बल देने का उल्लेख है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि हमारी भारतीय शिक्षा नीति में गांधी जी का जीवन दर्शन सत्य, अहिंसा,प्रेम पूर्णतः समाहित है। महात्मा गांधी जी के विचारों से जन-जन में ऊर्जान्वित विचार समाये हुए है, आगे भावी पीढ़ी के लिए यह ज्ञानवर्धक साबित होगी।
डॉ.मनीषा त्रिपाठी
प्रधान पाठक
राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित
शास.रविशंकर प्राथमिक शाला रायगढ़


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