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गुरु चरणों में समर्पण का अनुपम उत्सव:चक्रधर कला एवं संगीत महाविद्यालय में जीवंत हुई भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा:’वेद कला सम्मान’ से प्रतिभा का गौरव,गुरु वंदना से गुंजायमान हुआ संगीत साधना का पावन प्रांगण

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-रायगढ़ भारतीय संस्कृति में गुरु को साक्षात् परब्रह्म की संज्ञा दी गई है। गुरु केवल ज्ञान के प्रदाता नहीं,बल्कि जीवन के शिल्पकार, संस्कारों के संवाहक और व्यक्तित्व के निर्माता होते हैं। गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व इसी सनातन गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति कृतज्ञता,श्रद्धा और समर्पण का महापर्व है। इसी दिव्य भावना को साकार करते हुए विगत 29 जुलाई 26 को चक्रधर कला एवं संगीत महाविद्यालय,रायगढ़ में आयोजित गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धा, संगीत,संस्कृति और गुरु-भक्ति का ऐसा अनुपम उत्सव बन गया, जिसने उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को भाव-विभोर कर दिया।निर्धारित समय संध्या 4 बजे समारोह के मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त प्राध्यापक प्रो.महेंद्र सिंह खनुजा,विशिष्ट अतिथि सेवानिवृत्त प्राध्यापक भागीरथी पटेल तथा वरिष्ठ शिक्षाविद् पंडित कृष्णपाल शुक्ल का गरिमामय आगमन हुआ। संस्थान परिवार द्वारा पुष्पगुच्छ एवं आत्मीय अभिनंदन के साथ उनका स्वागत किया गया।भारतीय परंपरा के अनुरूप कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के छायाचित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन,धूप-दीप एवं पुष्पार्चन से हुआ। तत्पश्चात अतिथियों ने संगीत साधना के अमर पुरोधा स्वर्गीय जगदीश सिंह ‘मृदंगार्जुन’ तथा महान वाग्गेयकार कला गुरु स्वर्गीय वेदमणि सिंह ठाकुर ‘बेदम’ के छायाचित्रों पर माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। उस क्षण सम्पूर्ण सभागार गुरु-परंपरा के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता से सराबोर हो उठा।इसके पश्चात स्वागत एवं सम्मान समारोह संपन्न हुआ। तंत्रवाद्य गुरु श्री दिनेश राजभर ने पंडित कृष्णपाल शुक्ल का शाल,श्रीफल एवं पुष्पमाला से सम्मान किया। तबला गुरु श्री मनीष कुमार ने प्रो.महेंद्र सिंह खनुजा तथा श्री हरेंद्र कुमार पर्वत ने प्रो.भागीरथी पटेल का भारतीय संस्कृति के अनुरूप शाल,श्रीफल एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर अभिनंदन किया। सम्मान का प्रत्येक क्षण गुरु के प्रति आदर और भारतीय संस्कारों की गरिमा का सजीव प्रतीक बन गया।समारोह का एक अत्यंत गौरवपूर्ण एवं प्रेरणादायी क्षण तब आया,जब गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर कला गुरु वाग्गेयकार स्वर्गीय वेदमणि सिंह ठाकुर ‘बेदम’ स्मृति”वेद कला सम्मान” प्रदान किया गया। यह सम्मान प्रतिवर्ष उस साधक को समर्पित किया जाता है, जो अनुशासन,नियमित उपस्थिति,उत्कृष्ट प्रदर्शन एवं निरंतर संगीत साधना के माध्यम से अपने गुरु एवं संस्थान का गौरव बढ़ाता है।
सत्र 2025-26 के लिए सिंथेसाइज़र विभाग की प्रतिभाशाली साधिका कुमारी राशि साहू को”वेद कला सम्मान”से अलंकृत किया गया नगद पुरस्कार,सम्मान-पत्र एवं स्मृति-चिह्न प्रदान करते हुए अतिथियों ने उनके अनुकरणीय समर्पण, उत्कृष्ट साधना और अनुशासन की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा उज्ज्वल भविष्य के लिए मंगलकामनाएँ व्यक्त कीं | इस सुअवसर पर उनके पिता श्री सत्य नारायण साहू भी उपस्थित रहे । सम्मान की घोषणा होते ही पूरा सभागार देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।इसके उपरांत संस्थान की प्राचार्या श्रीमती चंद्रा देवांगन के निर्देशन में कला गुरु वेदमणि सिंह ठाकुर ‘बेदम’ द्वारा रचित सरस्वती वंदना राग भूपाली-कहरवा ताल“हे माँ तुझको है शत बार नमन”की सामूहिक प्रस्तुति ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। आराध्या कुमारी सिंह, दुर्गेश बरेठ, पूनम चंद्रवंशी,इति गौतम,अनन्या रेड्डी एवं सविता देवांगन ने अपनी मधुर स्वर-लहरियों से उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। हारमोनियम पर स्वयं प्राचार्या श्रीमती चंद्रा देवांगन तथा तबले पर श्री मनीष कुमार ने सधी हुई संगत प्रदान की। ध्वनि व्यवस्था का संचालन महाविद्यालय के कैप्टन विभोर उपाध्याय ने दक्षता एवं अनुशासन के साथ संभाला। इसके पश्चात विद्यार्थियों द्वारा गुरु ठाकुर वेदमणि सिंह की गुरु वंदना राग यमन,ताल-एक ताल,गुरु बिन नहीं आये ज्ञान”ने गुरु-भक्ति की भावधारा को और अधिक प्रगाढ़ कर दिया उद्बोधन क्रम में पंडित कृष्णपाल शुक्ल ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान देवताओं से भी श्रेष्ठ है। उन्होंने कहा कि स्वयं भगवान श्रीराम एवं श्रीकृष्ण ने भी गुरु के आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर यह संदेश दिया कि ज्ञान का प्रथम द्वार सदैव गुरु ही होते हैं
प्रो.भागीरथी पटेल ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि गुरु केवल शिक्षा नहीं देते, बल्कि मनुष्य के भीतर संस्कार,संवेदना और चरित्र का निर्माण करते हैं। उन्होंने कहा कि जिस समाज में गुरु का सम्मान जीवित रहता है,वहाँ संस्कृति और सभ्यता सदैव सुरक्षित रहती है।
मुख्य अतिथि प्रो.महेंद्र सिंह खनुजा ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा-गुरु जीवंत ईश्वर हैं। ईश्वर का साक्षात् दर्शन दुर्लभ हो सकता है,किन्तु गुरु के चरणों में समर्पित व्यक्ति ईश्वर के सान्निध्य का अनुभव अवश्य कर लेता है।”उन्होंने संस्थान की अनुशासित कार्यप्रणाली,संगीत साधना और विद्यार्थियों के संस्कारों की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए भावुक स्वर में कहा”आज मेरा विद्यार्थी देवलाल देवांगन जिस समर्पण से संगीत और संस्कार की अखंड ज्योति समाज में प्रज्ज्वलित कर रहा है,वह किसी भी गुरु के लिए सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार है।”समारोह का प्रभावशाली संचालन व्यवस्थापक श्री देव लाल देवांगन ने किया। अपने भावपूर्ण उद्बोधन में उन्होंने कहा आज मेरे जीवन का यह सबसे गौरवपूर्ण और भावनात्मक दिवस है। लगभग तिरेपन वर्ष पूर्व जिन गुरुओं ने मुझे शिक्षा,संस्कार और जीवन की दिशा प्रदान की,आज उन्हीं का सम्मान करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यदि मैं आज संगीत और संस्कृति के माध्यम से समाज में संस्कारों का दीप प्रज्ज्वलित कर पा रहा हूँ, तो यह मेरे गुरुओं के आशीर्वाद, उनके विश्वास और उनके द्वारा दिए गए जीवन-मूल्यों का ही प्रतिफल है।”उनके इन शब्दों ने सभागार को भावुक कर दिया और तालियों की गूँज देर तक वातावरण में प्रतिध्वनित होती रही।समारोह के अंतिम चरण में भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा का अत्यंत भावपूर्ण दृश्य उपस्थित हुआ,जब शताधिक विद्यार्थियों ने अपने गुरुजनों का विधिवत् पूजन एवं वंदन किया। चित्रकला गुरु श्रीमती रश्मी राठौर उपाध्याय,कथक गुरु सुश्री प्रियांशी बिजलवान,तबला गुरु श्री मनीष कुमार,तंत्रवाद्य गुरु श्री दिनेश राजभर,गायन गुरु एवं प्राचार्या श्रीमती चंद्रा देवांगन तथा श्री हरेंद्र कुमार पर्वत का तिलक,पुष्प, आरती एवं चरण वंदन करते हुये शाष्टांग प्रणाम कर अभिनंदन किया गया। श्रद्धा से झुके शिष्यों और स्नेह से भरे गुरुजनों के आशीर्वाद ने इस दृश्य को अविस्मरणीय बना दिया।समारोह में शताधिक अभिभावकों,विद्यार्थियों एवं संगीत प्रेमियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। उपस्थित प्रमुख जनों में नीतू गुप्ता, विनाश्री अग्रवाल,संगेश झा, रिषित अग्रवाल,पूजा
उपाध्याय,तमन्ना बिस्वास, अंकिता कुमारी,परिणीति शर्मा, प्रेरणा शर्मा,ज्योत्सना शर्मा,जान्हवी राठिया,निष्ठां आदित्य,अनुश्री मेहर,अर्नव राठौर,लक्ष कुमार,दीपक नामदेव, तन्मय सिंह,गुरशान सिंह ढिल्लों,आदित्य देवान,दीपांशु प्रसाद,आरव केशरवानी,राज कुमार केशरवानी अर्नव सिंह,श्रीमती सिंह,अर्जुन देवरतन,रितिका भौमिक श्रीमती मनीषा भौमिक,तारिणी साहू, रिद्धि साहू,ने अपनी सहभागिता से आयोजन की शोभा बढ़ाई।समापन अवसर पर सभी उपस्थितजनों को गुरु प्रसाद वितरित किया गया। श्रद्धा, साधना,संस्कृति और समर्पण से ओतप्रोत यह आयोजन केवल एक वार्षिक कार्यक्रम नहीं,बल्कि भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा के अमर आदर्शों का सजीव उत्सव बनकर उपस्थित जनसमूह की स्मृतियों में अंकित हो गया। यह आयोजन इस सत्य का पुनः उद्घोष करता है कि जहाँ गुरु का सम्मान,संस्कृति का संरक्षण और संगीत की साधना साथ-साथ चलती है, वहीं से संस्कारित समाज का निर्माण होता है।कार्यक्रम को सफल, सुव्यवस्थित एवं गरिमामय बनाने में श्रीमती भगवती देवानागन,श्री प्रकाश देवांगन,उषा विश्वकर्मा एवं कल्पना बरेठ का विशेष योगदान रहा। संस्थान परिवार ने उनके समर्पित सहयोग के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया | कार्यक्रम संध्या 7 बजे समाप्त हुआ ।

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