”
रायगढ़ भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने आध्यात्मिकता को कभी जीवन से अलग नहीं माना। यहाँ धर्म का अर्थ केवल उपासना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर करुणा, संयम, सत्य, श्रम और लोकमंगल की चेतना जगाना रहा है। इसी कारण भारत की आश्रम-परंपरा केवल तपस्वियों के निवास की व्यवस्था नहीं रही; वह ज्ञान, सेवा, शिक्षा और संस्कार की ऐसी सामाजिक संस्था बनी, जिसने युगों तक भारतीय जीवन को दिशा दी।
ऋषि-परंपरा के इन आश्रमों में तप और त्याग जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही श्रम, अनुशासन और लोककल्याण भी। भारतीय सभ्यता के अनेक श्रेष्ठ विचार इन्हीं आश्रमों की साधना-भूमि से विकसित हुए और उन्होंने समाज को केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एवं नैतिक आधार भी प्रदान किया।प्राचीन ऋषि-आश्रमों से लेकर आधुनिक सेवा-आश्रमों तक एक सूत्र निरंतर दिखाई देता है—आत्मकल्याण और लोककल्याण का अभिन्न संबंध। जहाँ साधना केवल व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज के दुःख को कम करने का संकल्प बन जाती है, वहीं आश्रम अपनी वास्तविक सार्थकता प्राप्त करता है।
इसी समृद्ध परंपरा का एक सशक्त विस्तार है रायगढ़ जिले के वनांचल क्षेत्र स्थित बनोरा आश्रम, जिसने पिछले तीन दशकों से अधिक समय में आध्यात्मिक साधना को मानव सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ते हुए एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है।
31 जुलाई 1993 को अघोर परंपरा के प्रतिष्ठित संत औघड़ संत बाबा प्रियदर्शी राम जी ने अपने गुरु अघोरेश्वर भगवान राम जी की प्रेरणा से इस आश्रम की आधारशिला रखी। प्रारंभिक दिनों में घास-फूस की एक साधारण कुटिया से प्रारंभ हुई यह साधना आज सेवा, संस्कार और समता के विस्तृत केंद्र के रूप में विकसित हो चुकी है। जिसके केंद्र में मनुष्य और मानवता है।
”घास-फूस की एक कुटिया, गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और मानव सेवा का दृढ़ संकल्प-“
31 जुलाई 1993 को अघोर परम्परा के संत औघड़ संत बाबा प्रियदर्शी राम जी ने अपने परम पूज्य गुरु अघोरेश्वर भगवान राम जी की प्रेरणा से बनोरा में साधना का आरम्भ किया। प्रारम्भ में वहाँ न कोई भव्य परिसर था, न संसाधनों का विस्तार; केवल घास-फूस की एक कुटिया, गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और समाज सेवा का दृढ़ संकल्प था।
अघोर परम्परा के इस महामंत्र—“अघोरान्ना परो मन्त्रः, नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्।”—को जीवन का आधार बनाकर उन्होंने साधना और सेवा की ऐसी यात्रा प्रारम्भ की, जो धीरे-धीरे जनविश्वास का आधार बनती गई।
गुरु परंपरा :अनुशासन और उत्तरदायित्व से समाजसेवा तक
अघोर परंपरा में गुरु को केवल आध्यात्मिक शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टा माना जाता है। औघड़ संत परम पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी ने अपने गुरु परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी के तप,साधना सेवा-दर्शन को जीवन का लक्ष्य बनाया।अघोर परंपरा में यह विश्वास और भी गहरा है कि गुरु का वास्तविक स्वरूप बाह्य व्यक्तित्व नहीं, बल्कि चेतना और आचरण में प्रकट होता है।परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी ने आध्यात्मिक जीवन को समाज की पीड़ा से जोड़ते हुए स्पष्ट संदेश व मार्गदर्शन दिए कि – “मानव सेवा ही सर्वोच्च साधना है।”यही कारण है कि अघोर परंपरा ने अध्यात्म को समाज से जोड़ते हुए सेवा को साधना का अनिवार्य अंग बनाया।
बाबा प्रियदर्शी राम जी ने इसी विचार को अपने जीवन का आधार बनाया। बनोरा आश्रम की यात्रा इसी पूजा और प्रार्थना के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, नशामुक्ति, सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता तथा ग्रामीण उत्थान के कार्यक्रम निरंतर संचालित होते रहे हैं। इस दृष्टि से आश्रम केवल धार्मिक संस्था नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का केंद्र भी है।
मानव सेवा ही सबसे बड़ी साधना-
किसी भी आध्यात्मिक संस्था की सार्थकता उसके लोकहितकारी कार्यों से आँकी जाती है। बनोरा आश्रम ने इस कसौटी पर स्वयं को निरंतर सिद्ध करने का प्रयास किया है।किसी भी आध्यात्मिक संस्था या आश्रम का मूल्य उसके भवनों या अनुयायियों की संख्या से नहीं, बल्कि समाज के प्रति उसकी उपयोगिता से आँका जाना चाहिए। इस दृष्टि से बनोरा आश्रम और उससे प्रेरित अन्य सेवा केंद्रों ने समय-समय पर स्वास्थ्य, शिक्षा ,दहेज़ उन्मूलन,नशा मुक्ति, आत्मनिर्भर बनाने और राहत कार्यों के माध्यम से उल्लेखनीय योगदान देने का प्रयास किया है।
बनोरा, डभरा ,जिगना और परमार्थ आश्रम प्रयागराज सहित विभिन्न आश्रमों में समय-समय पर निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाते हैं, जिनमें विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा स्वास्थ्य परीक्षण, आवश्यक जाँच तथा औषधि वितरण की व्यवस्था की जाती है। ग्रामीण अंचलों में ऐसे शिविर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ग्रीष्म ऋतु में राहगीरों के लिए शीतल पेयजल की व्यवस्था, शीतकाल में जरूरतमंदों को कंबल एवं वस्त्र वितरण तथा प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत सामग्री उपलब्ध कराना आश्रम की सेवा-परंपरा का नियमित अंग है।
इसी क्रम में प्रयागराज स्थित परमार्थ सेवा आश्रम द्वारा संचालित “बाबा प्रियदर्शी राम मानव कायाकल्प सेवा” विशेष उल्लेखनीय है। इस सेवा के अंतर्गत निराश्रित एवं असहाय लोगों को स्नान, स्वच्छ वस्त्र, भोजन तथा स्वास्थ्य परीक्षण जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराकर उनके आत्मसम्मान को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। यह सेवा करुणा और मानवीय गरिमा का सुंदर उदाहरण है।
शिक्षा : संस्कार और आधुनिकता का समन्वय
किसी भी समाज का भविष्य उसकी शिक्षा पर निर्भर करता है। इसी विश्वास के साथ श्री अघोरेश्वर विद्या मंदिर के माध्यम से विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण एवं संस्कारनिष्ठ शिक्षा प्रदान की जा रही है। विद्यालय में आधुनिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों के संतुलित विकास पर विशेष बल दिया जाता है।
आज जब शिक्षा का बड़ा भाग बाज़ारवादी प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हो रहा है, तब ऐसी संस्थाएँ यह याद दिलाती हैं कि ज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल आजीविका नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता का विकास भी है।वर्तमान समय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए आधुनिक सुविधाओं से युक्त सीबीएसई अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालय की स्थापना की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण का आधार मानने की यह दृष्टि आश्रम की विशिष्ट पहचान है।
समता और अभेद का दर्शन-
अघोर परंपरा का मूल स्वर समता है। यहाँ जाति, वर्ग, ऊँच-नीच अथवा सामाजिक विभाजन के लिए कोई स्थान नहीं है। आश्रम का वातावरण इस विचार को व्यवहार में रूपांतरित करता दिखाई देता है। उपासना स्थल में बाहरी आडंबर की अपेक्षा आंतरिक श्रद्धा को महत्व दिया जाता है।
आश्रम परिसर में प्रवेश करते ही अनुशासन, स्वच्छता, हरियाली और शांति का अनुभव होता है। वृक्षों, पुष्पों और सुव्यवस्थित वातावरण के बीच स्थापित आदर्श,प्रेरक वचन आगंतुकों को आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करते हैं। यहाँ पूजा का आधार कर्मकांड नहीं, बल्कि भाव, सेवा और आत्मानुशासन है।
बाबा प्रियदर्शी राम जी का यह संदेश आज भी आश्रम की कार्यशैली में स्पष्ट दिखाई देता है—“पूजा सामग्री की नहीं, शक्ति और भाव की होती है।”
गुरु : देह नहीं, चेतना-
अघोर दर्शन में गुरु को केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि चेतना का प्रतीक माना गया है। परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी का यह संदेश आज भी अनुयायियों का मार्गदर्शन करता है—
“गुरु देह नहीं, प्राण हैं; प्राण की पूजा ही सच्ची पूजा है।”
यही कारण है कि आश्रम में श्रद्धा का केंद्र बाह्य स्वरूप नहीं, बल्कि गुरु द्वारा स्थापित जीवन-मूल्य हैं। यही मूल्य साधकों और श्रद्धालुओं को सेवा,संयम और आत्मानुशासन की प्रेरणा देते हैं।बनोरा आश्रम की तीन दशक से अधिक की यात्रा इसी सत्य की साक्षी है कि आध्यात्मिकता का सर्वोच्च रूप मनुष्य के भीतर करुणा, सेवा,अनुशासन और उत्तरदायित्व का विकास करना है। किसी भी आश्रम की सफलता उसके स्थापत्य में नहीं, बल्कि उन मनुष्यों में दिखाई देती है, जो वहाँ से बेहतर नागरिक, बेहतर परिवारजन और बेहतर इंसान बनकर निकलते हैं।
आश्रम की भूमिका-
आज जब समाज उपभोक्तावाद, सामाजिक विघटन, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति,पारिवारिक विघटन , नैतिक संकट और मानसिक तनाव जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है,तब ऐसे संस्थानों का महत्व और बढ़ जाता है, जो व्यक्ति के भीतर संवेदनशीलता, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करें।
निस्संदेह, किसी भी आध्यात्मिक संस्था का वास्तविक मूल्य समाज के प्रति उसके योगदान से निर्धारित होता है। यदि साधना समाज सेवा से जुड़ती है, शिक्षा संस्कार से जुड़ती है और अध्यात्म लोकमंगल से जुड़ता है, तभी उसकी सार्थकता सिद्ध होती है।बनोरा आश्रम की तीन दशक से अधिक की यात्रा इसी संदेश को पुष्ट करती है कि आध्यात्मिकता का सर्वोच्च स्वरूप मानवता की सेवा और चरित्र-निर्माण में निहित है। यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि भी है और भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।
भविष्य की दिशा-“
आज भारत विश्वगुरु बनने का स्वप्न देख रहा है। यह स्वप्न केवल आर्थिक प्रगति से पूरा नहीं होगा। इसके लिए ऐसे नागरिकों की आवश्यकता होगी,जिनमें चरित्र,करुणा,अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व का समन्वय हो। ऐसे व्यक्तित्व केवल विद्यालयों में नहीं, बल्कि परिवार,समाज और आश्रम जैसी संस्कार-परंपराओं के संयुक्त प्रयास से निर्मित होते हैं।
इसी दृष्टि से बनोरा आश्रम की यात्रा केवल एक संस्था की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस भारतीय परम्परा की निरंतरता है, जो मानती है कि मनुष्य का वास्तविक उत्थान भीतर से प्रारम्भ होता है।
*31 जुलाई का स्थापना दिवस केवल एक संस्थागत उत्सव नहीं, बल्कि उस जीवन-दृष्टि का स्मरण है, जो हमें यह सिखाती है कि – *”मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं, सेवा से बड़ी कोई साधना नहीं और चरित्र से बड़ी कोई उपलब्धि नहीं।”*
परम पूज्य श्री अघोरेश्वर महाप्रभु जी से यही प्रार्थना है कि यह सेवा-यज्ञ निरंतर विस्तार पाता रहे और करुणा, समता, सदाचार तथा राष्ट्रकल्याण की यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देती रहे। बनोरा अर्थात “बनो राम” को चरितार्थ करते हुए
मानवता,आदर्श व चरित्र निर्माण का आध्यात्मिक शक्ति पीठ है आश्रम बनोरा।
।।गुरुदेव के श्री चरणों में कोटि कोटि प्रणाम।
— गणेश कछवाहा
काशीधाम, रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
gp.kachhwaha@gmail.com


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