रायगढ़ हिन्दी भाषा प्रकृति प्रदत्त व सार्वभौमिक है।जिस प्रकार जीव जंतुओं को स्थलीय आहट जलतरंग या वायु वेग से उत्पन्न ध्वनियों की अनुभूति होती है,उसी प्रकार मानव जन्म से ही मातृभाषा के स्वर को अनुभव करता है।यह ध्वनियां एवं अनुभूतियां हिन्दी भाषा के अतिरिक्त अन्य किसी भाषा में लिपिबद्ध नहीं हो सकती। अर्थात् हिन्दी भाषा ही अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है।
अभिव्यक्ति मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है,जो परस्पर विचारों के विनिमय का माध्यम है। यद्यपि अभिव्यक्ति का माध्यम कोई भी भाषा, बोली हो सकती है। राष्ट्रभाषा हिन्दी में की गई अभिव्यक्ति संपूर्णता युक्त होती है।हर देश और हर भाषा के जीवन में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जो उन्हें चिरकाल के लिए बदल देते हैं, विभिन्न स्तर पर प्रयास चलते रहते हैं, लेकिन हिन्दी और साथ ही अन्य सभी भारतीय भाषाओं के लिए डिजिटल क्रांति एक मौका है,जिसे यदि पकड़ लिया जाए तो निश्चित ही एक बड़ी छलांग लगाई जा सकती है।कोरोना काल में नई तकनीक ने हिन्दी को बढ़ावा देने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।आनलाईन पुस्तकों के प्रकाशन ने जहां एक तरफ पाठकों तक पहुंच को आसान एवं सरल बनाया वहीं दूसरी ओर नव लेखकों को कम लागत में अपनी पुस्तकें तैयार करवाने में सहूलियत दी है।एक तरफ कवि सम्मेलन, सेमीनार बंद हुए तो दूसरी ओर सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यू-ट्यूब ,ब्लाग, फेसबुक, वाट्स एप भी हिन्दी को आम आदमी तक सुगम ,सरल तरीके से पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। हिन्दी में साफ्टवेयर बनाने के लिए प्रयास की आवश्यकता है। वित्तीय संसाधन साथ ही कुछ हिन्दी प्रेमी तकनीक दक्ष युवा इसका दायित्व बखूबी निर्वहन कर सकते हैं।
यदि न्यायिक अभिव्यक्ति हिन्दी भाषा के माध्यम से होगी तो न सिर्फ न्यायिक प्रणाली की गरिमा बढ़ेगी वरन् हिन्दी भाषा भी अपने वैशिष्ट्य गुणों के कारण नये आयाम स्थापित करेगी। न्यायालय के कार्यों में हिन्दी के माध्यम से अभिव्यक्ति न होने के कारण प्रायः मर्मगत अभाव उत्पन्न हो जाता है। जिससे विधि विशेषज्ञों, अधिवक्ताओं तथा न्यायिक अधिकारियों के मध्य विभ्रम की स्थिति निर्मित होती है।जिसकी क्षति अंततः वाली को ही होती है। अंग्रेजी भाषा में न्यायिक अभिव्यक्ति का संदर्शित होना साधन मात्र है।श्रेषट साध्य के लिए साधन भी श्रेष्ठ होना नितांत आवश्यक है।यह श्रेष्ठता हमें राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रदान करती है। न्याय के मर्म को आत्मसात करने के लिए न्यायिक कार्य हिन्दी में संपादित करना अनिवार्य होना चाहिए।यदि यह कार्य रूप में परिणित हो जाए,तो न्यायिक अभिव्यक्ति में हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग कर लोकत्व का संरक्षण और भी अपरिहार्य हो जाता है। हिन्दी भाषा की अभिव्यक्ति से वादी- प्रतिवादी न्यायिक अधिकारी के समक्ष अपने हृदय की पीड़ा, कठिनाइयों को विवेकपूर्ण विचारों के माध्यम से व्यक्त कर सहजता से न्यायिक कार्यवाही को ग्राह्य कर लेता है।
न्यायिक अभिव्यक्ति हिन्दी में होने के फलस्वरूप आमजन तथा नागरिकों पर विधिक ज्ञान का सीधा लाभ एवं प्रभाव स्वाभाविक रूप से दृष्टिगोचर होगा।
राष्ट्रीय एकता में भी हिन्दी का अनुपम योगदान है।जो कि भारतीय संस्कृति की पोषक है, हिन्दी भाषा सर्वोत्तम है। हिन्दी भाषा ने ही भारत को एक सूत्र में पिरोया है। जिसमें भावों के संप्रेषण की कोई बाधा नहीं आती है।हिन्दी भाषा सबसे मीठी,सहज
सरल,है।हमारा यह कर्तव्य है राष्ट्रभाषा हिन्दी को सच्चे हृदय से अपनाएं, हिन्दी बोलें, लिखें, पढ़ें प्रचार – प्रसार में बहुमूल्य योगदान दें।
डॉ.मनीषा त्रिपाठी
प्रधानपाठक
शास.रविशंकर प्राथमिक शाला रायगढ़ ( छत्तीसगढ़)
राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित
हिन्दी दिवस विशेष,शीर्षक -“हिन्दी भाषा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम”
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