रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मेला का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है। कभी यह मेला केवल दो-तीन दिनों तक सीमित नहीं रहता था, बल्कि लगभग एक माह तक इसकी रौनक बनी रहती थी। जिले के शहर से लेकर गांवों तक जन्माष्टमी मेले को लेकर ऐसा उत्साह रहता था कि अलग-अलग जिलों और दूर-दराज क्षेत्रों से रिश्तेदार मेला देखने रायगढ़ पहुंचते थे और परिवारों में कई-कई दिनों तक मेहमान बनकर ठहरते थे।प्रेस रिपोर्टर क्लब के प्रदेश सचिव श्याम गुप्ता ने जन्माष्टमी मेले के लगातार गिरते स्वरूप पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि संभवतः आज के शासन-प्रशासन को रायगढ़ के ऐतिहासिक जन्माष्टमी मेले के गौरवशाली इतिहास की पूरी जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस मेले की पहचान कभी पूरे क्षेत्र में थी, उसे केवल औपचारिक आयोजन बनकर रह जाने से बचाने की आवश्यकता है। उन्होंने शासन-प्रशासन से आग्रह किया कि इस ऐतिहासिक मेले के पुराने स्वरूप, परंपरा और सांस्कृतिक महत्व को समझते हुए इसके संरक्षण और विस्तार के लिए ठोस पहल की जाए।सर्पंच संघ के जिला अध्यक्ष एवं प्रदेश उपाध्यक्ष हिमांशु चौहान ने कहा कि जिस समय रायगढ़ में आज जैसी आधुनिक सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध नहीं थे, उस समय यहां का जन्माष्टमी मेला अपनी भव्यता और लोकप्रियता के कारण इतिहास रचता था। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब सीमित संसाधनों के बावजूद यह मेला इतनी प्रसिद्धि हासिल कर सकता था,तो आज आधुनिक सुविधाओं के दौर में इसकी लोकप्रियता और भव्यता कम क्यों होती जा रही है? उन्होंने इसे रायगढ़ की सांस्कृतिक विरासत के लिए चिंताजनक बताते हुए मेला के पुराने गौरव को वापस लाने की मांग की।
वहीं प्रेस रिपोर्टर क्लब के जिला उपाध्यक्ष परमजीत सिंह भाटिया ने अपने बचपन की यादें साझा करते हुए कहा कि जब भी रायगढ़ के श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मेले की चर्चा होती है,उन्हें अपना बचपन याद आ जाता है। उन्होंने कहा कि मेले में लगने वाले सर्कस से लेकर गौरीशंकर मंदिर की आकर्षक सजावट तक का वह दृश्य आज भी उनकी आंखों के सामने है। यह मेला केवल रायगढ़ ही नहीं, बल्कि तत्कालीन मध्यप्रदेश और वर्तमान छत्तीसगढ़ एवं ओडिशा क्षेत्र तक अपनी पहचान रखता था।प्रेस रिपोर्टर क्लब परिवार ने कहा कि जिस प्रकार रायगढ़ के ऐतिहासिक चक्रधर समारोह को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मेले की ऐतिहासिकता और सांस्कृतिक महत्व को भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के प्रयास होने चाहिए। इसके लिए शासन-प्रशासन के साथ जिले के दानदाताओं, सामाजिक संगठनों, व्यापारियों और आम नागरिकों को भी आगे आना चाहिए।क्लब ने कहा कि मेले को आधुनिकता के साथ जोड़ते हुए उसकी ऐतिहासिक परंपराओं,सांस्कृतिक कार्यक्रमों,लोककला और धार्मिक आस्था को संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां रायगढ़ की इस गौरवशाली सांस्कृतिक पहचान को जान और महसूस कर सकें।प्रेस रिपोर्टर क्लब परिवार ने जनहित में शासन-प्रशासन से अपील की है कि रायगढ़ की ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत को केवल स्मृतियों तक सीमित न रहने दिया जाए, बल्कि उसे जीवंत रखते हुए जन्माष्टमी मेले को नई पहचान और नई ऊंचाई प्रदान करने की दिशा में ठोस पहल की जाए।
रायगढ़ के ऐतिहासिक जन्माष्टमी मेले की पहचान बचाने उठी आवाजकभी एक माह तक चलता था मेला,घर-घर आते थे रिश्तेदार और दूर-दराज से उमड़ता था जनसैलाबचक्रधर समारोह की तरह जन्माष्टमी मेले को भी मिले राष्ट्रीय पहचानप्रेस रिपोर्टर क्लब ने शासन-प्रशासन और दानदाताओं से ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने की अपील की
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